दलाल, दस्तावेज और करोड़ों की जमीन?”आदिवासी की जमीन पर भू-माफियाओं का हमला?” निःसंतान गोंड़ परिवार की करोड़ों की जमीन हड़पने की साजिश! राजस्व रिकॉर्ड में कथित फर्जीवाड़ा, तहसील से पंचायत तक मिलीभगत के आरोप?
विवादित भूमि की खरीद की तैयारी में बाहरी लोगों की एंट्री, खरीददारों की भूमिका भी जांच के घेरे में

“मिसल रिकॉर्ड में गोंड़, लेकिन नामांतरण किसी और के नाम?”1926-28 के दस्तावेजों को नजरअंदाज कर कथित तौर पर बदले गए अधिकार, असली वारिस दर-दर भटकने को मजबूर?
असल वारिस का हक कुचला गया?”“कलेक्टर तक पहुंची शिकायत, फिर भी कार्रवाई ठंडी?”

कोरबा। कोरबा जिले में एक बार फिर आदिवासी जमीन के रिकॉर्ड में कथित छेड़छाड़ का गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि निःसंतान आदिवासी गोंड़ परिवार की शासकीय पट्टे की जमीन को फर्जी तरीके से दूसरे व्यक्ति के नाम पर चढ़ाकर करोड़ों रुपए की जमीन बेचने की तैयारी की जा रही है। पूरे मामले में राजस्व विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है।
बताया जा रहा है कि स्वर्गीय घासीराम पिता दादूराम गोंड़, जो अनुसूचित जनजाति वर्ग से थे, उनकी मृत्यु के बाद जमीन का नामांतरण उनके वास्तविक वारिस के नाम पर किए जाने के बजाय मिलते-जुलते नाम और पिता के नाम का सहारा लेकर दूसरे व्यक्ति को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। आरोप है कि स्व. घासीराम पिता दयाराम के पुत्र इतवार सिंह तथा बांकीमोगरा के एक व्यक्ति की मिलीभगत से यह पूरा खेल रचा गया।

मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि वर्ष 1926-28 के मिसाल रिकॉर्ड में घासीराम को स्पष्ट रूप से “गोंड़” जाति का दर्ज किया गया है। पटवारी के प्रतिवेदन में भी उन्हें अनुसूचित जनजाति वर्ग का बताया गया, लेकिन इसके बावजूद पोड़ी उपरोड़ा के तत्कालीन तहसीलदार द्वारा इन तथ्यों को नजरअंदाज कर कथित रूप से इतवार सिंह को लाभ पहुंचाने वाला आदेश पारित कर दिया गया। पीड़ित परिवार का आरोप है कि इस गलत आदेश ने वास्तविक हकदार रूप सिंह के अधिकारों को कुचल दिया, जिसके कारण परिवार आज आर्थिक संकट और बदहाली का सामना कर रहा है।
मृत्यु प्रमाण पत्र पर भी उठे सवाल

पूरा मामला तब और संदिग्ध हो जाता है जब घासीराम के मृत्यु प्रमाण पत्रों में अलग-अलग पिता का नाम दर्ज पाया गया। एक प्रमाण पत्र में पिता का नाम “दयाराम” जबकि दूसरे में “दादूराम” लिखा गया है। जबकि मृत्यु तिथि और ग्राम पंचायत एक ही है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पंचायत सचिव स्तर पर भी दस्तावेजों में हेरफेर किया गया? ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह केवल नामांतरण का मामला नहीं बल्कि सुनियोजित तरीके से आदिवासी जमीन हड़पने का प्रयास है, जिसमें पंचायत से लेकर तहसील स्तर तक मिलीभगत की आशंका है।
जमीन खरीदने वालों की भूमिका भी जांच के घेरे में
सूत्रों के अनुसार कुसमुण्डा निवासी रामनारायण श्रीवास इस विवादित जमीन को खरीदने की कोशिश में लगे हुए हैं। ऐसे में उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर विवादित और संदेहास्पद रिकॉर्ड वाली जमीन की खरीदी की तैयारी क्यों की जा रही थी।
कलेक्टर से शिकायत, फिर भी कार्रवाई नहीं
मामले की शिकायत कलेक्टर स्तर तक पहुंच चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से पीड़ित परिवार और ग्रामीणों में नाराजगी है। लोगों की मांग है कि मिसल बंदोबस्त काल से अब तक के सभी रिकॉर्ड, वंशवृक्ष और नामांतरण दस्तावेजों की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। ग्रामीणों ने मांग की है कि यदि रिकॉर्ड में छेड़छाड़, फर्जीवाड़ा या राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और दलालों पर कठोर आपराधिक कार्रवाई की जाए।









